| बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| विषय | अंग्रेजों का भारत में विस्तार |
| प्रमुख शक्ति | ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी |
| निर्णायक शुरुआत | प्लासी का युद्ध, 1757 |
| अगला बड़ा चरण | बक्सर का युद्ध, 1764 |
| आर्थिक आधार | 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी |
| प्रमुख विस्तार नीति | सहायक संधि |
| सहायक संधि से जुड़े शासक | लॉर्ड वेलेजली |
| प्रमुख विलय नीति | हड़प नीति |
| हड़प नीति से जुड़े शासक | लॉर्ड डलहौजी |
| महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी | मैसूर, मराठा, सिख आदि |
| विस्तार का बड़ा परिणाम | कंपनी का भारतीय राजनीति पर प्रभुत्व |
| अगला निर्णायक मोड़ | 1857 का विद्रोह और 1858 में क्राउन शासन |
प्रश्न: अंग्रेजों का भारत में राजनीतिक विस्तार किस घटना के बाद निर्णायक रूप से शुरू हुआ?
उत्तर: 1757 के प्लासी के युद्ध को भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभुत्व की निर्णायक शुरुआत माना जाता है। इसके बाद 1764 के बक्सर युद्ध और 1765 के दीवानी अधिकार ने कंपनी की आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति को मजबूत किया। आगे मैसूर, मराठा और सिख शक्तियों के विरुद्ध युद्ध तथा सहायक संधि और हड़प नीति जैसी नीतियों ने ब्रिटिश विस्तार को और व्यापक बनाया।
परिचय
अंग्रेजों का भारत में विस्तार अचानक नहीं हुआ था। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में मूल रूप से व्यापार करने के उद्देश्य से आई थी, लेकिन समय के साथ उसने सैन्य शक्ति, कूटनीति, संधियों, राजस्व नियंत्रण और विलय की नीतियों का इस्तेमाल करके राजनीतिक सत्ता हासिल की।
इस प्रक्रिया में 1757 का प्लासी का युद्ध एक महत्वपूर्ण मोड़ बना। इसके बाद 1764 का बक्सर युद्ध और 1765 में दीवानी अधिकार मिलने से कंपनी के पास राजनीतिक प्रभाव के साथ आर्थिक संसाधन भी आ गए। आगे चलकर कंपनी ने दक्षिण भारत में मैसूर, पश्चिम में मराठों और उत्तर-पश्चिम में सिख शक्ति को चुनौती दी।
इसलिए अंग्रेजों का भारत में विस्तार समझने के लिए केवल युद्धों को याद करना पर्याप्त नहीं है। इसे तीन प्रमुख माध्यमों से समझना चाहिए:
- युद्ध और सैन्य विजय
- संधि एवं कूटनीतिक नियंत्रण
- विलय और प्रशासनिक नीतियाँ
अंग्रेजों का भारत में विस्तार कैसे हुआ?
ब्रिटिश विस्तार को सरल क्रम में इस प्रकार समझा जा सकता है:
व्यापार → राजनीतिक हस्तक्षेप → बंगाल पर प्रभाव → प्लासी → बक्सर → दीवानी अधिकार → क्षेत्रीय शक्तियों से युद्ध → सहायक संधि → विलय की नीतियाँ → व्यापक ब्रिटिश प्रभुत्व
ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआत व्यापारिक संस्था के रूप में हुई थी, लेकिन 18वीं शताब्दी के मध्य तक भारतीय राज्यों के राजनीतिक संघर्षों में हस्तक्षेप करने की उसकी क्षमता बढ़ गई थी। प्लासी और बक्सर के बाद कंपनी ने राजस्व और प्रशासनिक शक्ति का उपयोग अपनी सैन्य एवं राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में किया।
प्लासी का युद्ध 1757
प्लासी का युद्ध कब हुआ?
23 जून 1757 को बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला और रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच प्लासी का युद्ध हुआ।
इस युद्ध में कंपनी को सफलता मिली और बंगाल की राजनीति में उसका प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ गया। मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया, जिससे कंपनी को बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप का बड़ा अवसर मिला।
प्लासी के युद्ध का महत्व
प्लासी को केवल एक युद्ध के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है। परीक्षा में इसका महत्व ज्यादा पूछा जाता है।
- बंगाल में कंपनी का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा।
- कंपनी ने बंगाल की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप शुरू किया।
- कंपनी को आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ।
- आगे के विस्तार के लिए बंगाल एक महत्वपूर्ण आधार बना।
- अंग्रेजों के व्यापारिक हितों को राजनीतिक शक्ति का सहारा मिला।
Exam Trick:
प्लासी = राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत
बक्सर का युद्ध 1764
बक्सर का युद्ध कब हुआ?
22 अक्टूबर 1764 को बक्सर का युद्ध हुआ।
इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का सामना मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना से हुआ। कंपनी की विजय ने उसके राजनीतिक प्रभाव को बंगाल से आगे उत्तर भारत तक मजबूत किया।
बक्सर के युद्ध का महत्व
बक्सर की विजय ने कंपनी को केवल बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली नहीं बनाया, बल्कि उसे एक मजबूत सैन्य-राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
इसके बाद 1765 में इलाहाबाद की संधि के माध्यम से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। इससे कंपनी को राजस्व प्राप्त करने की महत्वपूर्ण शक्ति मिली।
Exam Trick:
बक्सर = सैन्य विजय + दीवानी अधिकार का मार्ग
प्लासी और बक्सर में अंतर
| आधार | प्लासी का युद्ध | बक्सर का युद्ध |
| वर्ष | 1757 | 1764 |
| प्रमुख ब्रिटिश नेता | रॉबर्ट क्लाइव | हेक्टर मुनरो |
| मुख्य विरोधी | सिराज-उद-दौला | मीर कासिम, शुजा-उद-दौला, शाह आलम द्वितीय |
| क्षेत्र | बंगाल | बिहार क्षेत्र |
| प्रमुख परिणाम | बंगाल की राजनीति में कंपनी का प्रभाव | कंपनी की सैन्य-राजनीतिक शक्ति मजबूत |
| आगे का परिणाम | कंपनी को बंगाल में प्रभाव | 1765 में दीवानी अधिकार का मार्ग |
1765 की इलाहाबाद संधि और दीवानी अधिकार
बक्सर की विजय के बाद 1765 की इलाहाबाद संधि ब्रिटिश विस्तार का महत्वपूर्ण चरण बनी।
कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, अर्थात राजस्व वसूली का अधिकार मिला। इस आर्थिक शक्ति ने कंपनी को अपनी सेना और प्रशासन को मजबूत करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए।
इसे इस प्रकार याद करें:
प्लासी → राजनीतिक प्रभाव
बक्सर → सैन्य प्रभुत्व
दीवानी → आर्थिक शक्ति
अंग्रेजों का दक्षिण भारत में विस्तार
बंगाल में प्रभाव बढ़ाने के बाद कंपनी का सामना दक्षिण भारत की शक्तियों और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों से हुआ।
कर्नाटक युद्ध
कर्नाटक के युद्धों ने दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच शक्ति-संघर्ष को प्रभावित किया। अंततः अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई और दक्षिण भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक चुनौती कमजोर हुई।
इससे कंपनी को आगे दक्षिण भारत में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर मिला।
मैसूर और अंग्रेज
दक्षिण भारत में मैसूर अंग्रेजों के विस्तार के सामने प्रमुख शक्ति था। मैसूर के शासकों हैदर अली और टीपू सुल्तान ने कंपनी के विस्तार का विरोध किया।
अंग्रेजों और मैसूर के बीच चार प्रमुख युद्ध हुए:
| युद्ध | अवधि | प्रमुख परिणाम |
| प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1767–1769 | मैसूर की स्थिति मजबूत रही |
| द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1780–1784 | युद्ध का अंत मंगलौर की संधि से |
| तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1790–1792 | टीपू सुल्तान को क्षेत्रीय नुकसान |
| चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1799 | टीपू सुल्तान की मृत्यु और मैसूर पर ब्रिटिश प्रभाव में वृद्धि |
1799 का चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध अंग्रेजों के दक्षिण भारतीय विस्तार में निर्णायक घटना बना।
अंग्रेजों का मराठों पर विस्तार
मराठा शक्ति 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों के सामने सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्तियों में से एक थी।
अंग्रेजों और मराठों के बीच तीन आंग्ल-मराठा युद्ध हुए:
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध — 1775–1782
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध — 1803–1805
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध — 1817–1818
1817–1818 के तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद मराठा राजनीतिक शक्ति निर्णायक रूप से कमजोर हुई और भारत में कंपनी के व्यापक प्रभुत्व का रास्ता साफ हुआ।
मराठा साम्राज्य का विस्तृत अध्ययन GkDost के अलग लेख में उपलब्ध है:
मराठा साम्राज्य Notes
सहायक संधि क्या है?
सहायक संधि (Subsidiary Alliance) अंग्रेजों की ऐसी नीति थी जिसके माध्यम से भारतीय राज्यों को प्रत्यक्ष रूप से विलय किए बिना ब्रिटिश राजनीतिक नियंत्रण के अधीन लाया जाता था।
इस नीति को विशेष रूप से लॉर्ड वेलेजली के समय व्यापक रूप मिला। वेलेजली 1798 में भारत आया और उसने ब्रिटिश प्रभाव बढ़ाने के लिए सहायक संधि का प्रभावी इस्तेमाल किया।
सहायक संधि की प्रमुख शर्तें
संधि स्वीकार करने वाले भारतीय शासक को सामान्यतः:
- अपने राज्य में ब्रिटिश सेना रखने की अनुमति देनी होती थी।
- उस सेना के खर्च का भार उठाना पड़ता था।
- ब्रिटिश रेजीडेंट को दरबार में स्वीकार करना पड़ता था।
- विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय की क्षमता सीमित हो जाती थी।
- अन्य यूरोपीय शक्तियों से स्वतंत्र संबंध स्थापित करना कठिन हो जाता था।
- खर्च न देने की स्थिति में क्षेत्र अंग्रेजों को देना पड़ सकता था।
सहायक संधि का प्रभाव
इस नीति ने अंग्रेजों को बिना हर राज्य से सीधे युद्ध किए राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने में मदद की।
इसे याद रखें:
सहायक संधि = राज्य रहेगा, लेकिन उसकी स्वतंत्रता सीमित होगी।
हड़प नीति क्या है?
हड़प नीति (Doctrine of Lapse) लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में अपनाई गई विलय नीति थी।
इस नीति के अंतर्गत कंपनी ने उन रियासतों को अपने अधीन करने का प्रयास किया जिनके शासक की मृत्यु के बाद प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं था और कंपनी ने दत्तक उत्तराधिकारी को उत्तराधिकार के लिए स्वीकार नहीं किया।
हड़प नीति से जुड़े प्रमुख राज्य
परीक्षा के लिए प्रमुख नाम:
- सतारा
- संभलपुर
- झाँसी
- नागपुर
महत्वपूर्ण: अवध का विलय हड़प नीति के अंतर्गत नहीं हुआ था। 1856 में अवध को कुशासन के आरोप के आधार पर ब्रिटिश क्षेत्र में मिला लिया गया। यह distinction परीक्षा में महत्वपूर्ण है।
हड़प नीति का प्रभाव
इस नीति ने कई भारतीय शासकों और राजघरानों में असंतोष पैदा किया। विशेष रूप से झाँसी जैसी रियासतों के विलय ने ब्रिटिश नीति के प्रति विरोध को बढ़ाया।
इसीलिए हड़प नीति को 1857 के विद्रोह की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़कर पढ़ना चाहिए।
अंग्रेजों का भारत में विस्तार: प्रमुख युद्ध और नीतियाँ
| घटना/नीति | वर्ष | महत्व |
| प्लासी का युद्ध | 1757 | बंगाल में कंपनी का राजनीतिक प्रभुत्व |
| बक्सर का युद्ध | 1764 | कंपनी की सैन्य-राजनीतिक शक्ति मजबूत |
| दीवानी अधिकार | 1765 | बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व अधिकार |
| प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1767–69 | मैसूर से संघर्ष की शुरुआत |
| तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1790–92 | मैसूर की शक्ति कमजोर |
| चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1799 | टीपू सुल्तान की मृत्यु |
| सहायक संधि का विस्तार | 1798 के बाद | अप्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण |
| द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध | 1803–05 | मराठा शक्ति पर बड़ा प्रभाव |
| तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध | 1817–18 | मराठा प्रभुत्व का अंत |
| सिंध का विलय | 1843 | उत्तर-पश्चिम में ब्रिटिश विस्तार |
| पंजाब का विलय | 1849 | सिख शक्ति पर निर्णायक विजय |
| हड़प नीति | 1848 के बाद | रियासतों के विलय का माध्यम |
| अवध का विलय | 1856 | कुशासन के आधार पर विलय |
अंग्रेजों का उत्तर-पश्चिम भारत में विस्तार
दक्षिण और मध्य भारत के बाद अंग्रेजों का ध्यान उत्तर-पश्चिम की ओर गया।
सिंध का विलय
1843 में सिंध ब्रिटिश नियंत्रण में आया। इससे ब्रिटिश शक्ति को उत्तर-पश्चिम दिशा में रणनीतिक लाभ मिला।
पंजाब का विलय
सिख शक्ति के साथ संघर्ष के बाद 1849 में पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हुआ।
इस प्रकार 19वीं शताब्दी के मध्य तक कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव स्थापित कर लिया था।
अंग्रेजों ने भारत पर कब कब्जा किया?
यह प्रश्न थोड़ा भ्रामक है, क्योंकि अंग्रेजों ने भारत पर एक ही वर्ष में कब्जा नहीं किया था।
भारत में ब्रिटिश सत्ता कई चरणों में बढ़ी:
1757 — प्लासी के बाद बंगाल में राजनीतिक प्रभुत्व
↓
1764 — बक्सर में निर्णायक विजय
↓
1765 — दीवानी अधिकार
↓
1799 — टीपू सुल्तान की हार
↓
1818 — मराठा शक्ति का निर्णायक पतन
↓
1843 — सिंध का विलय
↓
1849 — पंजाब का विलय
↓
1856 — अवध का विलय
↓
1857 — व्यापक विद्रोह
↓
1858 — कंपनी शासन समाप्त, ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन
अंग्रेजों के विस्तार की प्रमुख रणनीतियाँ
अंग्रेजों ने भारत में विस्तार के लिए केवल युद्ध का सहारा नहीं लिया। उनकी रणनीति बहुस्तरीय थी।
1. सैन्य शक्ति
प्लासी, बक्सर, मैसूर, मराठा और सिख शक्तियों के विरुद्ध युद्धों ने कंपनी के क्षेत्रीय प्रभुत्व को बढ़ाया।
2. कूटनीति
भारतीय राज्यों के बीच राजनीतिक मतभेदों और संघर्षों का लाभ उठाया गया।
3. सहायक संधि
राज्यों को ब्रिटिश सैन्य सुरक्षा पर निर्भर बनाकर उनकी विदेश नीति और राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित की गई।
4. राजस्व नियंत्रण
दीवानी अधिकार ने कंपनी को विशाल राजस्व स्रोत उपलब्ध कराया, जिससे सैन्य और प्रशासनिक विस्तार को आर्थिक आधार मिला।
5. विलय की नीतियाँ
डलहौजी के समय हड़प नीति और अन्य प्रशासनिक आधारों पर राज्यों का विलय किया गया।
1857 की क्रांति से अंग्रेजों के विस्तार का संबंध
अंग्रेजों का विस्तार केवल राजनीतिक नक्शा बदलने तक सीमित नहीं था। इससे भारतीय शासकों, सैनिकों, किसानों, जमींदारों और अन्य समूहों में अलग-अलग प्रकार के असंतोष पैदा हुए।
हड़प नीति, अवध का विलय, आर्थिक दबाव, प्रशासनिक हस्तक्षेप और सैन्य असंतोष जैसे कारकों ने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि को प्रभावित किया।
1857 की क्रांति का पूरा अध्ययन GkDost के इस लेख में किया जा सकता है:
1857 की क्रांति Notes

अंग्रेजों का भारत में विस्तार MCQs:
प्रश्न 1: प्लासी का युद्ध किस वर्ष हुआ था?
A. 1756
B. 1757
C. 1764
D. 1765
उत्तर: B. 1757
व्याख्या: प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला के बीच हुआ था।
प्रश्न 2: प्लासी के युद्ध के समय बंगाल का नवाब कौन था?
A. मीर जाफर
B. मीर कासिम
C. सिराज-उद-दौला
D. शुजा-उद-दौला
उत्तर: C. सिराज-उद-दौला
व्याख्या: 1757 के प्लासी युद्ध में कंपनी की सेना का सामना बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला से हुआ था।
प्रश्न 3: बक्सर का युद्ध किस वर्ष हुआ था?
A. 1757
B. 1760
C. 1764
D. 1765
उत्तर: C. 1764
व्याख्या: बक्सर का युद्ध 22 अक्टूबर 1764 को हुआ था और इसमें कंपनी की सेना ने संयुक्त भारतीय सेना को पराजित किया।
प्रश्न 4: बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध कौन-सा समूह था?
A. सिराज-उद-दौला, टीपू सुल्तान और मराठा
B. मीर कासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय
C. मीर जाफर, हैदर अली और शाह आलम
D. नाना साहेब, रानी लक्ष्मीबाई और बहादुर शाह
उत्तर: B. मीर कासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय
व्याख्या: बक्सर में मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना कंपनी से लड़ी थी।
प्रश्न 5: कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी कब मिली?
A. 1757
B. 1764
C. 1765
D. 1773
उत्तर: C. 1765
व्याख्या: बक्सर के बाद 1765 में इलाहाबाद की संधि के माध्यम से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई।
प्रश्न 6: सहायक संधि प्रणाली किस गवर्नर-जनरल से विशेष रूप से संबंधित है?
A. वॉरेन हेस्टिंग्स
B. लॉर्ड वेलेजली
C. लॉर्ड डलहौजी
D. लॉर्ड कैनिंग
उत्तर: B. लॉर्ड वेलेजली
व्याख्या: लॉर्ड वेलेजली ने 1798 के बाद सहायक संधि को ब्रिटिश विस्तार की प्रमुख नीति के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया।
प्रश्न 7: सहायक संधि का मुख्य उद्देश्य क्या था?
A. भारतीय राज्यों को पूर्ण स्वतंत्रता देना
B. भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाना
C. व्यापारिक कर समाप्त करना
D. मुगल सत्ता पुनर्स्थापित करना
उत्तर: B. भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाना
व्याख्या: सहायक संधि के माध्यम से भारतीय राज्यों की सैन्य और विदेश नीति पर ब्रिटिश प्रभाव बढ़ता था।
प्रश्न 8: हड़प नीति किस गवर्नर-जनरल से संबंधित है?
A. लॉर्ड वेलेजली
B. लॉर्ड कॉर्नवालिस
C. लॉर्ड डलहौजी
D. लॉर्ड विलियम बेंटिंक
उत्तर: C. लॉर्ड डलहौजी
व्याख्या: लॉर्ड डलहौजी के समय हड़प नीति का इस्तेमाल रियासतों के विलय के लिए किया गया।
प्रश्न 9: निम्न में से कौन हड़प नीति से संबंधित राज्य था?
A. झाँसी
B. अवध
C. हैदराबाद
D. मैसूर
उत्तर: A. झाँसी
व्याख्या: झाँसी हड़प नीति के अंतर्गत ब्रिटिश नियंत्रण में आने वाली प्रमुख रियासतों में शामिल थी।
प्रश्न 10: अवध का विलय किस आधार पर किया गया था?
A. हड़प नीति
B. कुशासन
C. समुद्री व्यापार
D. धार्मिक नीति
उत्तर: B. कुशासन
व्याख्या: अवध का विलय 1856 में कुशासन के आरोप के आधार पर किया गया था; इसे हड़प नीति के अंतर्गत नहीं रखा जाना चाहिए।
प्रश्न 11: टीपू सुल्तान की मृत्यु किस युद्ध में हुई?
A. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध
B. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
C. तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
D. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध
उत्तर: D. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध
व्याख्या: 1799 के चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू सुल्तान की मृत्यु हुई और मैसूर पर ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा।
प्रश्न 12: तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध किस अवधि में हुआ?
A. 1775–1782
B. 1780–1784
C. 1803–1805
D. 1817–1818
उत्तर: D. 1817–1818
व्याख्या: तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद मराठा राजनीतिक शक्ति निर्णायक रूप से कमजोर हुई।
प्रश्न 13: सिंध का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कब हुआ?
A. 1839
B. 1843
C. 1849
D. 1856
उत्तर: B. 1843
व्याख्या: 1843 में सिंध ब्रिटिश नियंत्रण में आया और उत्तर-पश्चिम दिशा में कंपनी की शक्ति बढ़ी।
प्रश्न 14: पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कब हुआ?
A. 1843
B. 1845
C. 1849
D. 1856
उत्तर: C. 1849
व्याख्या: द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद 1849 में पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हुआ।
प्रश्न 15: 1857 के विद्रोह से ठीक पहले निम्न में से कौन-सा क्षेत्र 1856 में अंग्रेजों द्वारा मिला लिया गया था?
A. पंजाब
B. अवध
C. सिंध
D. सतारा
उत्तर: B. अवध
व्याख्या: 1856 में अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश क्षेत्र में मिला लिया गया था।
प्रश्न 16: अंग्रेजों के भारत में विस्तार का सही क्रम कौन-सा है?
A. बक्सर → प्लासी → दीवानी
B. प्लासी → बक्सर → दीवानी
C. दीवानी → प्लासी → बक्सर
D. प्लासी → दीवानी → बक्सर
उत्तर: B. प्लासी → बक्सर → दीवानी
व्याख्या: 1757 में प्लासी, 1764 में बक्सर और 1765 में दीवानी अधिकार का क्रम रहा।
प्रश्न 17: निम्न में से कौन-सी नीति अप्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण का साधन थी?
A. सहायक संधि
B. हड़प नीति
C. स्थायी बंदोबस्त
D. रैयतवाड़ी व्यवस्था
उत्तर: A. सहायक संधि
व्याख्या: सहायक संधि के माध्यम से रियासतों को ब्रिटिश सैन्य एवं राजनीतिक प्रभाव के अधीन लाया गया।
प्रश्न 18: अंग्रेजों के विस्तार में दीवानी अधिकार का मुख्य महत्व क्या था?
A. धार्मिक नियंत्रण
B. न्यायिक स्वतंत्रता
C. राजस्व प्राप्ति
D. समुद्री शक्ति
उत्तर: C. राजस्व प्राप्ति
व्याख्या: दीवानी अधिकार ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व वसूली की शक्ति दी, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
प्रश्न 19: भारत में कंपनी के विस्तार का कौन-सा माध्यम युद्ध पर आधारित था?
A. प्लासी
B. सहायक संधि
C. हड़प नीति
D. रेजीडेंसी व्यवस्था
उत्तर: A. प्लासी
व्याख्या: प्लासी सैन्य संघर्ष था, जबकि सहायक संधि मुख्यतः कूटनीतिक-राजनीतिक नियंत्रण का साधन थी।
प्रश्न 20: 1858 का भारतीय इतिहास में अंग्रेजी सत्ता के संदर्भ में क्या महत्व है?
A. प्लासी का युद्ध हुआ
B. दीवानी अधिकार मिले
C. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ
D. सहायक संधि लागू हुई
उत्तर: C. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ
व्याख्या: 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में भारत का प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
अंग्रेजों का भारत में विस्तार FAQs:
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अंग्रेजों का भारत में विस्तार कैसे हुआ?
अंग्रेजों ने भारत में विस्तार युद्ध, कूटनीति, राजस्व नियंत्रण, सहायक संधि और विलय की नीतियों के माध्यम से किया। प्लासी और बक्सर के बाद कंपनी की शक्ति तेजी से बढ़ी।
-
अंग्रेजों ने भारत पर कब कब्जा किया?
अंग्रेजों ने भारत पर किसी एक वर्ष में कब्जा नहीं किया। 1757 से 19वीं शताब्दी के मध्य तक विभिन्न युद्धों, संधियों और विलय की नीतियों के माध्यम से उनका नियंत्रण बढ़ा।
-
प्लासी के युद्ध का महत्व क्या था?
प्लासी के युद्ध ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभुत्व की निर्णायक शुरुआत की।
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बक्सर का युद्ध क्यों महत्वपूर्ण था?
बक्सर की विजय ने कंपनी की सैन्य शक्ति मजबूत की और 1765 में दीवानी अधिकार प्राप्त करने का मार्ग तैयार किया।
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सहायक संधि क्या थी?
यह ऐसी व्यवस्था थी जिसमें भारतीय शासक ब्रिटिश सैन्य सुरक्षा स्वीकार करते थे, लेकिन इसके बदले उन्हें ब्रिटिश सेना का खर्च उठाना और अपनी विदेश नीति पर ब्रिटिश प्रभाव स्वीकार करना पड़ता था।
-
सहायक संधि किसने लागू की?
लॉर्ड वेलेजली ने इसे 1798 के बाद ब्रिटिश विस्तार की प्रमुख नीति के रूप में व्यापक रूप से लागू किया।
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हड़प नीति किसने लागू की?
हड़प नीति लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल से संबंधित है।
निष्कर्ष
अंग्रेजों का भारत में विस्तार किसी एक युद्ध या नीति का परिणाम नहीं था। यह लगभग एक शताब्दी तक चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया थी, जिसमें प्लासी ने राजनीतिक प्रवेश, बक्सर ने सैन्य प्रभुत्व और दीवानी अधिकार ने आर्थिक आधार प्रदान किया।
इसके बाद मैसूर और मराठों जैसी शक्तियों से युद्ध, सहायक संधि के माध्यम से अप्रत्यक्ष नियंत्रण, तथा डलहौजी की हड़प नीति और अन्य विलय नीतियों ने ब्रिटिश साम्राज्य का क्षेत्र बढ़ाया।
1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन चुकी थी, लेकिन उसी वर्ष के व्यापक विद्रोह ने कंपनी शासन की नींव हिला दी। इसके परिणामस्वरूप 1858 में कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।

